होली और होलिका दहन क्यों मनाते हैं?- जानिए इसका इतिहास

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एक समय की बात है- सतयुग जमाने में हिरण्यकश्यप नामक एक राजा था। जो कि धरती पर आतंक फैलाए हुए था, किसी को जीने नहीं देता था। इसके पीछे हिंदू पुराण और भागवत के हिसाब से सत्य भी साबित होती है। झांसी से 80 किलोमीटर दूर एरच नगर है। जो‌‌ आज भी प्रहलाद के नाम से जाना जाता है।

हिरण्यकश्यप बहुत तपस्या करके भगवान ब्रह्मा जी को प्रसन कर लिया था। और ब्रह्मा जी की ओर से उसे वरदान भी प्राप्त हो गया था कि, उसे धरती पर कोई अस्त्र या शस्त्र प्रहार नहीं कर सकता। और कोई पशु हो या पंछी, देवता हो या राक्षस, रात हो या दिन, नर हो या नारी, कोई भी नहीं मार सकेगा।

राक्षस राजा हिरण्यकश्यप के नाम से राजधानी हुआ करता था। उसे ब्रह्मा जी के द्वारा वरदान मिलने पर संपूर्ण राज्य में यह घोषणा कर दी कि भगवान की जगह अब हमारी पूजा होनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो उसे मार डालेंगे। जान से मारने की डर से सब लोग धरती पर हिरण्यकश्यप की पूजा करने लगे।

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लेकिन स्वयं उनका बेटा प्रहलाद भगवान विष्णु का भक्त निकला। प्रहलाद भगवान विष्णु का पूजन करने लगे। अपने पिता के पूजा करने से इंकार कर दिया। प्रहलाद को मारने के लिए उनके पिता ने कई तरीके ढूंढे। भगवान विष्णु की कृपा से वह बचता ही गया। प्रहलाद को मारने के लिए उनके पिता ने उन्होंने रात में सर्प की ढेर में बैठा कर अधेरी कोठरी में छोड़ दी। हाथी से कुचलवाया। सैनिकों से बिकाचल पर्वत से नीचे फेंकने को कहा।

परंतु पर्वत से फेंकने के बाद भगवान विष्णु के गोद में बैठे मिले। आज वो पर्वत ढकोली के नाम से प्रसिद्ध है। जब हिरण्यकश्यप प्रहलाद को मारने में असफल हुआ, तो उनकी बहन बोली कि हमें वरदान मिला है कि हम आग में नहीं जल सकती।

एरच नगर में एक लकड़ी का ढेर बना दिया गया। जिसपे तब प्रहलाद को होलिका की गोद में बैठा कर आग लगा दिया गया की प्रहलाद जलकर राख हो जाएगा। लेकिन भगवान विष्णु के कृपा से होलिका जल गई और प्रहलाद बच गए।

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फिर हिरण्यकश्यप अपने हाथों से मारने का प्रयास किया। तब भगवान विष्णु नर सिंह का रूप धारण कर सिंह के नाखून से हिरण्यकश्यप को मार डालें। उसी के बाद होलिका दहन मनाने का शुरू हुआ। प्रह्लाद की याद में इसलिए इस दिन होलिका दहन किया जाता है। प्रहलाद का अर्थ आनंद होता है। उस दिन बैर उत्पीड़न के प्रतीक होलिका जलती है। और प्रेम उत्साह के प्रतीक प्रहलाद सही रहते हैं। कुछ लोग कहते हैं, कि भगवान कृष्ण में राक्षसिन पुतना को पतन किए थे। इस दिन नेपाल और भारत में भी धूमधाम से होली मनाया जाता है। मथुरा और बरसाना में लठमार होली मनाई जाती है।

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