विनम्र राजा की कहानी

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किसी समय भारत के एक प्रतापी राजा हुआ करता था। राजा न्याय वादी एवं बहुत ही शक्तिशाली था। राजा के अनुरूप महारानी भी धार्मिक प्रवृत्ति की ही थी। राजा की ख्याति दूर दूर तक फैली हुई थी।

धार्मिक प्रवृत्ति होने के कारण दूर-दूर से ज्ञानी, पंडित, भिक्षु , सन्यासी का आना जाना राज दरबार में लगा रहता था। जो भी राज दरबार में आता था राजा रानी सिंहासन छोड़ के उनके स्वागत में हमेशा तत्पर रहते थे।

वह हमेशा सभी भिक्षु सन्यासियों को सिर झुका कर अभिनंदन करते तथा पूरे सम्मान के साथ राज दरबार में लाते तथा यथा उचित उपहार एवं धन देकर ही विदाई करते।

राजा के मंत्रियों को यह बात बहुत खटकती थी।वे सोचते थे इतने बड़े सम्राट होने के बाद भी दीन हीन भिक्षु सन्यासियों के सामने राजा सिर क्यों झुकाते हैं। एक दिन मंत्री ने राजा से कहा की है महाराज आप अति बलशाली एवं महा प्रतापी है।

दूर-दूर तक कोई भी राजा आपके सामान नहीं है फिर भी आप इन निर्धन हीन भिक्षु सन्यासियों के सामने अपना सिर क्यों झुकाते हैं यह आपको शोभा नहीं देता।

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मंत्री की बात सुनकर राजा ने महारानी की ओर देखा और मंद मंद मुस्कुरा कर बड़ा ही निर्मल और सरल भाव से मंत्री को आदेश दिया कि तुम जा और कहीं से मरा हुआ बकरा तथा एक मरा हुआ आदमी का सिर लेकर आ।

मंत्री इस अजीब आदेश को सुनकर हैरान रह गया। परंतु राजा का आदेश था तो पूरा करना ही था उसने अपने सैनिकों को भेज कर एक मरा हुआ बकरा तथा मरा हुआ आदमी का सर लेकर आने को कहा।

कुछ समय बाद सैनिकों ने एक मरा हुआ बकरा और एक आदमी का सर लेकर राज दरबार में पहुंचा राजा ने मंत्री को आदेश दिया कि आप खुद जाइए और दोनों सर को बेच कर आइए। मंत्री जी राजा के आदेश को मानती हूं बाजार में गए तथा शाम को राज दरबार में उपस्थित हुए।

उसने महाराज से कहा हे महाराज बकरी का सर तो बिक गया परंतु आदमी का सर नहीं बिका। राजा ने कहा बाजार में इसे किसी को मुफ्त में दे कर आओ। मंत्री फिर गए और कुछ समय के बाद लोट कर आए और आकर कहा महाराज मुफ्त में भी कोई मनुष्य का सर नहीं लेना चाहता है।

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अब राजा ने मुस्कुराकर मंत्री को कहा कि अब आपको समझ में आ गया होगा की इंसान के सिर का मूल्य क्या है। कोई इसे मुफ्त मे भी नहीं लेना चाहता। मतलब साफ है यह मूल्य हीन है।

फिर इससे क्या फर्क पड़ता है कि यह सिर किस के सामने झुकता है और किसके कदमों में गिरता है। मंत्रियों को राजा की बात समझ में आ गई और कभी भी दोबारा राजा की विनम्रता पर कोई सवाल नहीं किया।

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