मुख्य पृष्ठ कविता कोश समय की पाठशाला (एक मज़ेदार कविता)

समय की पाठशाला (एक मज़ेदार कविता)

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आओ आज समय की बात करता हूं,
बातों-बातों में दिन को रात करता हूं,
आओ आज समय की बात करता हूं।

जो इसे खर्च करे वो खुद खर्च हो जाते है,
कई महल हुए खँडहर तो कई खेत बंजर हो जाते है,
ये ना कभी रूका है ना कभी रूकेगा दोस्त,
कई बसंत हुए पतझर और कई जवान अमर हो जाते है,
कल की आज और आज की कल कहता हूं,
आओ आज समय की बात करता हूं।

कुछ लोग गरीब होते है दौलत से,
कुछ आदर्शों से कुछ इंसानियत से,
कुछ किस्मत से भी होते हैं और होते हैं कुछ अपनी आदत से,
पर समय की भी गरीबी होती है,
आओ उसीका पाठ पढ़ता हूं,
आओ आज समय की बात करता हूं।

जैसे मोल होता है चीजो का पैसे में,
वैसा ही एक मोल है जीवन का समय में,
कहते है ना जितना खर्च करोगे सावधानी से,
उतना ही बचोगे परेशानी से।

इसकी अपनी एक परिभाषा है मोल की,
चीजों का नहीं मगर इंसानियत के माप-तोल की,
अच्छाई बुराई और पहचान का सार कहता हूं,
आओ आज समय की बात करता हूं।

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जो होता है गरीब किस्मत से आदत से या दौलत से,
न समझो तुम उसको गरीब समय के पैमाने से,
गांधी सुभाष कलाम इन सबका नाम कहां मिटा है,
अपने गुणों की पोटली से दुनिया को इन्होने जीता है,
हर काम ऐसा करो कि लोग तुम्हे आप कहे,
समय के इस धंधे में तुम्हे सबका बाप कहे,
इंसान की इस पूजा में मैं समय का पाठ करता हूं,
आओ एक बार फिर समय की बात करता हूं।

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