“इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं” ओम प्रकाश आदित्य जी की कविता

ओम प्रकाश आदित्य जिनका जन्म हरयाणा के गुरुग्राम में 5 नवंबर सन 1936 को हुआ था। ओम प्रकाश जी दिल्ली के एक स्कूल में शिक्षक थे जो मजाकिया और व्यंग्यात्मक हिंदी कविताओं के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने 1970-80 के दशक में दूरदर्शन के ‘हास्य कवि सम्मेलन’ से प्रसिद्धि हासिल की।

उनके प्रसिद्ध कवितावो में से एक कविता “इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं” (“idhar bhi gadhe hain, udhar bhi gadhe hain” kavita) को आपके सामने प्रस्तुत करते है।

कृप्या अपने सीट की पेटी बांध ले, ये कविता बहुत है मजेदार और आनंदित करने वाला है और जो आपको औरो के साथ शेयर करने के लिए मजबूर कर देगा।

“इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं” कविता (“idhar bhi gadhe hain, udhar bhi gadhe hain” kavita)

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूं, गधे ही गधे हैं

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गधे हँस रहे, आदमी रो रहा है
हिन्दोस्तां में ये क्या हो रहा है

जवानी का आलम गधों के लिये है
ये रसिया, ये बालम गधों के लिये है

ये दिल्ली, ये पालम गधों के लिये है
ये संसार सालम गधों के लिये है

पिलाए जा साकी, पिलाए जा डट के
तू विहस्की के मटके पै मटके पै मटके

मैं दुनियां को अब भूलना चाहता हूं
गधों की तरह झूमना चाहता हूं

घोडों को मिलती नहीं घास देखो
गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश देखो

यहाँ आदमी की कहाँ कब बनी है
ये दुनियां गधों के लिये ही बनी है

जो गलियों में डोले वो कच्चा गधा है
जो कोठे पे बोले वो सच्चा गधा है

जो खेतों में दीखे वो फसली गधा है
जो माइक पे चीखे वो असली गधा है

मैं क्या बक गया हूं, ये क्या कह गया हूं
नशे की पिनक में कहां बह गया हूं

मुझे माफ करना मैं भटका हुआ था
वो ठर्रा था, भीतर जो अटका हुआ था

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