बाढ़ और बिहार

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महज एक वर्ण आपकी विचारधारा, उसका विस्तार एवं प्रभाव को बताने में सक्षम है। हिन्दी व्याकरण का प्रभाव मानवों के मस्तिष्क पर ऐसा पड़ेगा, मैंने कभी सोचा नहीं था। मूर्धन्य ‘ष’ जब दन्त ‘स’ हो जाता है तब प्राचीन काल में बिहार का खजाना अर्थात् कोष (Treasure) कही जाने वाली ‘कोषी’ नदी आज बिहार का श्राप बनकर ‘कोसी’ हो जाती है। क्या कभी आपने सोचा है कि हमारे पूर्वजों ने कोषी को राज्य का खजाना क्यों कहा था। कोषी सात सात अलग-अलग नदियों के जल से अपना आकार लेती है, यथा:- तमोर, अरूण एवं सुनकोसी।यह सुनकोसी पाँच धाराएं यथा:- दूधकोसी, भोटकोसी, तमकोसी, लिखू खोला एवं इंद्रावती से पूर्ण होती है। कोसी नौगछिया के कुरसेला में गंगा में मिलती है। इसके पहले इसकी सात धाराएं सात अलग-अलग भागों में धमनियों की भाँति विभक्त होकर उत्तर बिहार के कुल 126 किमी. के क्षेत्र को सिंचित करती है और फिर गंगा से मिलने के पूर्व एक हो जाती हैं। इतिहास भले ही हमारा बहुत विराट रहा हो, भले ही हमनें ऋग्वेद जैसे पवित्र धर्मग्रंथ में सिंधु, यमुना एवं गंगा जैसी नदियों के लिए समर्पित ‘नदी सूक्त’ की रचना की हो एवं उन्हें पूजते आये हो किंतु हमारे वर्तमान ने नदियों को शापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ा है। महज बिहार ही नहीं अपितु देश के अन्य राज्य भी भौतिक सुखों की पूर्ति हेतु नदियों को बदनाम करके उसका गला घोटने से बाज नहीं आते। बहरहाल, मैं बात बिहार का ही करूंगा। एक दूसरी शापित नदी बेचारी ‘कर्मनाशा’ है। दक्षिण बिहार के दक्षिण-पश्चिम में बहकर बिहार एवं उत्तर प्रदेश के बीच प्राकृतिक सीमा रेखा का निर्माण करती है। इस नदी का प्राचीन नाम ‘कुकर्मनाशा’ था अर्थात् जिसमें स्नान मात्र से आपके कुकर्मों का नाश हो जाता हो किंतु वर्तमान में बढ़ी हमारी पापाचारों की तीव्रता एवं पाप धोनें के दूसरे माध्यमों की खोज ने इस नदी को ‘कर्मनाशा’ अर्थात् वह जिसमें स्नान मात्र से आपके कर्मों का नाश हो जाएगा, बना दिया।

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एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर बिहार की कुल 76.8% जनसंख्या को बाढ़ से खतरा है। बिहार भारत की बाढ़ द्वारा प्रभावित कुल भूमि का 16.5% खुद में समाहित किए हुए है एवं यह भारत की बाढ़ द्वारा प्रभावित कुल जनसंख्या में 22.1% का हिस्सेदार है। बिहार में बाढ़ का इतिहास कोई नया नही है बल्कि इसका सदियों पुराना प्रमाण भी रहा है किंतु वे इतने विध्वंसक नहीं होते थे। सवाल फिर यही उठता है कि बिहार में बाढ़ पर इतना रोना क्यों? कारण साफ है और वह है बाढ़ का वीभत्स रूप एवं उसको खतरनाक बनाने वाली नदियां यथा:- महानंदा, बागमती, बूढ़ी गंडक, गंडक एवं घाघरा। रिपोर्ट बताते है कि बिहार में बाढ़ का खतरनाक एवं प्रलयंकारी रूप 1970 के बाद से देखने को मिला है। बिहार का बाढ़ बहुआयामी इस मामले में है कि इसका कोई एक कारक नही है एवं इसका प्रभाव किसी खास वर्ग तक सीमित भी नहीं है।

पहला महत्वपूर्ण कारक तटबंध (Embankments) है़। बिहार के बाढ़ पर गहन अध्ययन करने के बाद सुधीर शर्मा, दिनेश मिश्रा एवं गोपाल कृष्णा जी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि सरकार ने भले हीं पिछले कुछ दशकों में बिहार में 3000 km. से भी अधिक का तटबंध बना दिया हो किंतु इन्हीं दशकों में बाढ़ की तीव्रता 2.5 गुणी और भी अधिक हो गई है। यह रिपोर्ट इस बात का द्योतक है कि तटबंध बनाते समय सभी उपागमों को संज्ञान में नहीं लिया गया है।

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दूसरा महत्वपूर्ण कारक वृक्षों की कटाई (Deforestation) है। पिछले कुछ दशकों में नदियों के धार को कम करने एवं मृदा अपरदन को नियंत्रित करने के लिए लगाएं गए लाख से भी ज्यादा पेड़ों को काट दिया गया है। ऐसा करने से नदी की मुख्यधारा में गाद का भरपूर निक्षेप हुआ है एवं इसका परिणाम बाढ़ के रूप में हमारे सामने है।

तीसरा महत्वपूर्ण कारण फरक्का बराज है।बराज के निर्माण संदर्भ में भले ही यह बात कही जाती हो इसके बंगाल के जिलों में सिचांई की जाती है किंतु इसका भू-राजनीतिक कारण यह रहा है कि बांग्लादेश जैसे देश को कम पानी उपलब्ध हो पाएं। इस बराज के निर्माण से नदी की मुख्यधारा में इतना अधिक गाद का निक्षेप हुआ है कि समस्त जैवविविधता में उथल-पुथल सी मच गयी है एवं Backwater effect के कारण लगभग 100km के दायरे में बाढ़ आ जाती है।

चौथा महत्वपूर्ण कारक भागलपुर से पटना के बीच हो रहे Plantation Agriculture का प्रयास अर्थात् केले की खेती है।घनलोलुपता एवं भौतिक सुखों की पूर्ति हेतु हमनें नदी किनारे बसे समस्त जैवविविधता का नाश करके केले के पेड़ लगाए हैं।

पाँचवाँ एवं सबसे महत्वपूर्ण कारण अनायोजित शहरी विकास (Unplanned Urban Development) है। शहरी एवं विकसित होने के चक्कर में हमने नदियों को बाँधा, उनके जलग्रह (Catchment Area) का अतिक्रमण किया और बाढ़ रूपी परिणाम सामने है।

नदियों का एक गुण यह भी है कि वे अपने निर्धारित जलागम से एक इंच भी ज्यादा नहीं लेती हैंं। अगर वे अपनी धार में परिवर्तन करके किसी दूसरी दिशा की ओर अभिमुख भी होती हो तो दूसरी तरफ पहली दिशा में उतनी भूमि छोड़ देती हैं एवं इसका साक्षात् प्रमाण कोसी है। बिहार का भूगोल ऐसा है कि यहां बाढ़ को नियंत्रित (Flood Control) नहीं किया जा सकता है। यहां बस बाढ़ का कुशल प्रबंधन (Flood Management) ही किया जा सकता है। बिहार सरकार को जरूरी है कि Remote Sensing, Google Earth एवं Satellite Photography की मदद से नदी द्रोणी में NDVI (Normalised Difference Vegetation Index), NDBI (Normalised Difference Built-up Index) एवं LULC (Land use and land cover change) का नियमित अध्ययन हो ताकि भविष्य में आने वाले बाढ़ की तीव्रता का बड़ी आसानी से पता लगाया जा सके।SDRF, NGOs, Shelter Home एवं राहत कार्यों के लिए पहले ही सरकार अपनी तैयारी को आश्वस्त हो ले। सरकार को आवश्यक है कि वह उत्तर बिहार में भरपूर मात्रा में उपलब्ध Detention Basin (निरोध द्रोणी) अर्थात् चँवर (Chaurs) को सुदृढ़ करें। ये चँवर बड़ी मात्रा में बाढ़ के जल को सोख सकते हैं। जरूरी यह भी है कि राज्य में बाँस द्वारा भीषण जल निरोध की परंपरा को आधुनिक वैज्ञानिक रूप दिया जाए,यह बाढ़ नियंत्रण में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। सबसे जरूरी बात यह कि वह जनसंख्या नियंत्रण एवं शहरी विकास को सख्ती से अपने संज्ञान में ले ताकि नदी द्रोणी में हो रहे अतिक्रमण को रोका जा सके एवं बाढ़ के प्रभाव को निम्न किया जा सके।और अंततः यही कि हम अपनी पुरातन परंपरा को न भूलें, सभ्यता की पोषक इन नदियों को हम पूजें एवं अगर संभव हो तो इन नदियों से अपना मौन किंतु आत्मिक संबंध स्थापित करें।

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