आया मानसून झूम के- बकौल घाघ

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शुक्रवार की बादरी, रही शनिचर छाय।
घाघ कहै सुन घाघिनि, बिन बरसे नहीं जाए।।

shukravaar ki baadaree

ये घाघ है। सही समझे आप,वही छपरा वाले, अकबर के समकालीन, जो बाद में कन्नौज जाकर बस गए और जिनकी मौसम की समझ और दूरदर्शिता से प्रभावित होकर अकबर ने ‘घाघसराय’ नामक जगह बसा दिया। मौसम पूर्वानुमान में भले ही IMD(Indian Metrologicial Department) की चेतावनियां कुछ हद तक गलत हो जाए किंतु घाघ की कही हुई कहावतें आज भी प्रासंगिक है और यही कारण है कि हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में गाय-बैलों की खरीदारी से लेकर खेतों की जुताई एवं बीज-रोपनी से लेकर पके फसलों की कटाई, सब घाघ की कहावतों के निर्देशन में ही होता है। अभी भी सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में तो आप किसानों को खेतों में ऐसे मुहावरे एवं कहावतों को गुनगुनाते हुए अपने बैलों के साथ मौन संवाद स्थापित करते बड़ी आसानी से देख सकते है।सुबह नींद खुलते ही देखा कि जोरदार बारिश हो रही है और तभी घाघ की यह कहावत याद आ गई कि यदि बादल शुक्रवार से घेरकर शनिवार तक बने हुए है तो फिर बादल बिन बरसे हुए नही जायेंगे। हरहाल, मानसून या फिर सावन का यह मौसम बरसने का भी है। इस मौसम में बादलों के संदेशवाहक बनकर झीसीयां जब धरती तक पहुँचती है और बदले में धरती जब बादलों को उष्मीय एवं शीतलन के अवकलनीय अंतरों तथा पेड़ों द्वारा स्वाद के माध्यम से संदेश भेजती है तो नब्बे के दशकों वाला प्यार परिलक्षित होता है,जहां एक-दूसरे के लिए प्रगाढ़ भावनाएं एवं समर्पण भी है तो दूसरी तरफ लोक-लाज का डर भी। जब समस्त जनमानस अपने घरों में दुबके होते हैं तब पृथ्वी एवं बादल इस मानसूनी मौसम में एक-दूसरे के करीब आते है और उनके मिलन की पटकथा लिखी जाती है। अगर कोई घर से बाहर निकलने की कोशिश भी करता है तो बादल अपने पुरूषत्व, घोर गर्जना एवं वज्रपात द्वारा बड़ी आसानी से लोगों को घर में वापस भेज देता है और फिर धरती से अपने प्रेम संबंधों को और भी ज्यादा सुदृढ़ करता है। बादल के झीसी और बूंदाबांदी द्वारा पृथ्वी गर्भधारण करती है और इस मौसम में बीजों से नये जीवन का अंकुरण होता है, उस नये जीवन को धरती तबतक थामें रखती है, जबतक कि वह स्वावलंबी न हो जाएं और यही पृथ्वी के मातृत्व का परिचायक है।

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अपने होश भर में पहली बार “सिकोतारा देवी:- गुजरात में समुद्र की देवी” को प्रसन्न देखा। आखिर हो भी क्यों ना, उनका बेटा मानसून,जो इस बार हष्टपुष्ट और मोटा होकर लौटा है। इसबार EN:- El Nino कमजोर है और यही कारण है मानसून इतना प्रबल और प्रशस्त होकर भारत आया है।ENSO से भारतीय मॉनसून का व्युत्क्रम संबंध है जबकि La Nina से समानुपातिक संबंध है। किसी माँ को आखिर चाहिए भी क्या, यही न कि उसका बेटा या बेटी जब कभी भी घर लौटे तो मोटा-ताजा और ह्रृष्ट पुष्ट होकर लौटे और समाज के सर्वांगीण विकास में अपनी अग्रणी भूमिका निभाये। घर आने पर यदि कोई बच्चा माँ से पूछ भी दे कि माँ मैं मोटा हो गया हूँ क्या, तो माँ का उत्तर हमेशा नकारात्मक में एक कहावत द्वारा खत्म होता है कि ‘मुस मोटइहन आ लोढ़ा होइहन’ अर्थात् चूह मोटे होकर सिलवट वाला लोढ़ा ही होंगे, इससे ज्यादा कुछ नही। माँ के इस उत्तर में नही दिखाई देने वाला किंतु अथाह प्रेम समाहित होता है।

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मॉनसून भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे मजबूत कड़ी है, जिसकी लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस पर निर्भर है। जिस वर्ष मॉनसून कमजोर हो जाएं, भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ ‘कृषि’ भी झुक जाती है और साथ ही झुक जाते हैं वो मेहनतकश किसान के पीठ,जो मॉनसून को वास्तविक रूप में मॉनसून बनाते है।

मॉनसून से महज भारत के प्राथमिक या द्वितीयक क्षेत्र के उद्योग ही नही अपितु भारतीय समाज और विदेश-नीति भी प्रभावित होती है। ASEAN:- Association of South-East Asian Nations के कुल दस देशों के साथ भारत के सांस्कृतिक, धार्मिक और सामरिक मजबूती का एक महत्वपूर्ण कारण मॉनसून ही है। यह मॉनसून ही है जिसने इन देशों को पश्चिमीकरण (Westernization) के विरूद्ध दक्षिणीकरण (Southernization) की स्थापना का पाठ पढ़ाया और जिसे पश्चिमी दुनिया आज स्वीकार भी करती है। BIMSTEC:- Bay of Bengal Initiative for Multi Sectoral Technical and Economic Cooperation के साझीदार देशों के साथ भी मॉनसून को आधार बनाकर भारत इन देशों को कुशल नेतृत्व दे सकता है। यह मॉनसून ही है,जिसका सहारा लेकर पश्चिम के देशों ने भारत के साथ व्यापार एवं मैत्री संबंधों को स्थापित किया।मानसूनी हवाओं के सहारे ही पूर्व-मध्य और अरब देशों के लोग भारत आए तथा यहां के समाज में घुल-मिल गए।केरल की ‘मोपला’ जाति के भारत में उद्गम का आधार यह मॉनसून ही है। मॉनसून जलवायु क्षेत्र के देशों की अपनी अलग ही पहचान रही है, जो विश्व में दक्षिण एवं मध्य अमेरिका, पश्चिमी एवं मध्य अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया एवं दक्षिण तथा दक्षिण पूर्व एशिया में पायी जाती है और इसे Koppen ने अपने जलवायुवीय वर्गीकरण में ‘Am’ से इंगित किया है।इन महादेशों के जिन-जिन देशों में मॉनसूनी जलवायु पायी जाती है यथा:- Australia, Philippines, Indonesia, Uganda, Maldives, Bangladesh, India, Nigeria, Brazil, Taiwan, Vietnam, Miami (USA) इत्यादि, वहाँ के देश NATO, OPEC और OIC की भाँति भविष्य में अपना भी एक अलग फ्रंट तैयार कर सकते हैं, जहाँ व्यापार, सुरक्षा, संस्कृति एवं सामरिक मामलों का आदान-प्रदान बड़ी सुगमता से हो सकता है। भारत के मॉनसून के साथ प्रगाढ़ संबंधों की विवेचना जो घाघ करके चले गये, वो आज नि:स्तेज हो गई है, नई पीढ़ियां अपनी परंपराएं भूल रही हैं।

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घाघ और भारत के पूर्वकालिक संबंध इस बात का बोध कराते हैं कि वर्तमान दौर में, जब वैश्विक आपदा सर पर आन पड़ी है तब ऐसे में उन कहावतों पर गौर किया जाय, उन पर समीक्षाएँ हों और भारत को स्वर्णयुगीन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सभी कृषि उपादानों को पुनर्स्थापित किया जाय। तत्कालीन कहावतों को वर्तमान में उपलब्ध संसाधनों के संग रिश्ता स्थापित कर भविष्य में कृषि विकास हेतु संभावनाएं तलाशी जाय। ध्यान रहे, विकास तभी संभव है जब हम अपनी परंपराओं के साथ वैज्ञानिक उपलब्धियों के बीच सामंजस्य को स्थापित करेंगे।

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