20 वर्षों में सांप के काटने से भारत में लगभग 12 लाख लोगों की हो चुकी है मृत्यु।

हर साल पाचास हजार से ज्यादा लोग सांप काटने से मरते हैं भारत में। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं की दुनिया भर में हर साल सर्पदंश से लगभग एक लाख लोगों की मृत्यु होती है। इनमें आधे से अधिक मौत अकेले भारत में होता है। भारत में मौतों की आंकड़ा ज्यादा भी हो सकता है क्योंकि आज भी भारत में सांप काटने के बाद लोग अस्पताल की जगह झाड़-फूंक करने लगते हैं। सांप का जहर तेज असर करता है और मरीजों को अपनी गलती सुधारने का मौका नहीं देता। यह मौत कहीं दर्ज भी नहीं होती और ऐसा देखा जाए तो पिछले 20 वर्षों में यह लगभग 12 लाख के करीब है।

मशहूर सर्प वैज्ञानिक और भारत में स्नेक मैन नाम से मशहूर 

रोमुलस व्हिटकर की एक रिपोर्ट पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ साइंस  जो 2011 में छपी थी इसके अनुसार भारत में हर साल सांप काटने से 45900 से 50900 लोगों की मौत होती है। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि 97 प्रतिशत मौतें ग्रामीण इलाकों से होती है।

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रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश ,तेलंगाना ,बिहार ,झारखंड ,बंगाल में सबसे ज्यादा सर्पदंश से मृत्यु होती है।

जून से सितंबर के बीच मानसून के मौसम में सबसे अधिक मौतों की आंकड़ा इस रिपोर्ट में लिखी गई है क्योंकि इसी मौसम में सांप सबसे ज्यादा बाहर निकलते हैं।

भारत में मुख्यता 300 प्रकार के सांपों की प्रजातियां पाई जाती है। जिनमें 15 प्रजातियां ही जहरीली होती है। परंतु 98 प्रतिशत मौतें महज चार प्रकार के सांप के काटने से होता है। यह चार प्रकार के सांप हैं कोबरा ,रसल वाइपर, करैत और स्कल्ड वाइपर।

सांपों के मामले के जानकार कहते हैं आमतौर पर सांप खुद इंसानों से डरते हैं और तभी हमला करते हैं जब उन्हें लगता है है कि उन पर खुद खतरा है।

सर्पदंश की बढ़ती समस्या पर अंकुश लगाने के लिए डॉक्टरों को इसके इलाज के लिए दिशा निर्देशन तय करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ मिलकर वर्ष 2009 में नेशनल स्नेक बाइट मैनेजमेंट प्रोटोकॉल की रूपरेखा तैयार की थी लेकिन उसके बाद इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाई गई है।

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बेंगलुरु के सांपों के संरक्षण से जुड़े गेरी मार्टिन ने कहा देश में सांप काटने से होने वाली ज्यादातर मौतें रोकी जा सकती है। इसके लिए जागरूकता और सही समय पर सही इलाज की जरूरत है। देश में खासकर ग्रामीण इलाकों में स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में एंटी वेनोम की कमी है ।और उनके इस्तेमाल की सही जानकारी भी नहीं होने के कारण सैकड़ों लोगों की जान आसानी से  चली जाती है।

अत: सरकार इस दिशा में सही और उचित कदम उठाकर हर साल हो रहे इस मौत को रोक सकती है यदि वे सही इच्छाशक्ति के साथ इस विषय पर अपना ध्यान आकर्षित कर के सही से कदम उठाए तो, नहीं तो रिपोर्ट और तथ्य अपनी जगह हैं तथा मौतों की यह सिलसिला अपनी जगह है।

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